Wednesday, 20 July 2016
Saturday, 16 July 2016
मैं सदा शून्य का ध्यान किया करती हूँ
मैं सदा शून्य का ध्यान किया करती हूँ,
और अनहद का आह्वाहन किया करती हूँ ||१||
आशाएँ मेरी दृढ़, ज्यों खड़ा हिमाचल,
मानस का है प्रतिबिम्ब मेरे, गंगाजल |
रोकेगा मेरी गति को कौन जगत में,
मैं गिरि को ठोकर मार दिया करती हूँ ||२||
मेरी गति में विद्युत् जैसा कम्पन है,
वाणी में सागर के समान गर्जन है |
बादल जैसा चीत्कार किया करती हूँ,
आँधी सा हाहाकार किया करती हूँ ||३||
जग के ये सूरज चंदा चमचम तारे,
पाएँगे क्या मेरा प्रकाश बेचारे |
मैं सदा गरल का पान किया करती हूँ,
और अमृत में स्नान किया करती हूँ ||४||
मुझको लख विस्मित होता है जग सारा,
क्या जाने वह मेरे सुख को बेचारा |
चिन्ताएँ मेरे पास नहीं आती हैं,
पल पल मस्ती में गान किया करती हूँ ||५||
Thursday, 14 July 2016
ये बरखा का मौसम सजीला सजीला
ये बरखा का मौसम सजीला सजीला
घटाओं में मस्ती, हवाओं में थिरकन |
वो बलखाती बूँदों का फूलों से मिलना
वो शाख़ों का लहराके हर पल मचलना ||
नशे में है डूबी, क़दम लड़खड़ाती
वो मेघों की टोली चली आ रही है |
कि बिजली के हाथों से ताधिन ताधिनता
वो मादल बजाती बढ़ी आ रही है ||
पपीहा सदा ही पियू को पुकारे
तो कोयल भी संग में है सुर को मिलाती |
जवानी की मस्ती में मतवाला भँवरा
कली जिसपे अपना है सर्वस लुटाती ||
मौसम में ठण्डक, तपन बादलों में
अम्बुआ की बौरों से झरता पसीना |
सावन की रिमझिम फुहारों के संग ही
मन में भी अमृत की धारा बरसती ||
पगलाई बौराई है सारी ही धरती
चढ़ा है नशा पत्ते पत्ते पे भारी |
कि सुध बुध को बिसराके तन मन थिरकता
तो क्यों ना हरेक मन पे छाए जवानी ||
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